सीता हूँ मैं आज की नारी
राम तुम भी तो बन जाओ
हर एक नारी में है सीता
प़र राम कहाँ से मैं पाऊं ?
मन में हूंक उठती है ये
जब शूपणखों की जुल्फों
से राम के नयन उलझतें हैं
पैसा ,समय,प्यार लुटाते
बहुत खुश वो नज़र आतें हैं
पतिव्रता सीता के आंसू
इंतज़ार में बह-बह जातें हैं
घर ,बच्चे ,पति की सेवा
यही धर्म मैं निभातीं हूँ
राम अब तो लौट आओ
बुझते दिए की लौ मैं जलाती हूँ
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